COVID-19 : उद्धव ठाकरे कोरोना के चक्रव्यूह में , क्या बाहर निकल पाएंगे

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मुंबई: कोरोना वायरस की सबसे ज्यादा मार महाराष्ट्र पर पड़ी है. राज्य में रहने वाले लोगों को इस महामारी से बचाने की जिम्मेदारी जिस शख्स के कंधों पर है, वो हैं मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे. महाराष्ट्र में कोरोना की वजह से जो कुछ भी हो रहा है उसे देखकर कहा जा सकता है कि ठाकरे एक चक्रव्यूह में फंस गये हैं. कैसा है ये चक्रव्यूह और क्या उद्धव ठाकरे इससे निकल पायेंगे?




28 नवंबर 2008 को करीब महीनेभर तक चले सियासी ड्रामें के बाद जब उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तब किसी को भी इल्म नहीं था कि उनकी सरकार के 3 महीने पूरे होने से पहले ही राज्य पर एक ऐसा संकट आ जायेगा जिसकी न तो किसी ने कल्पना की थी और जिससे निपटने का किसी के पास अनुभव नहीं था. ये संकट कोरोना वायरस की शक्ल में आया. जनवरी से इक्का दुक्का मरीजों के मिलने की शुरूवात हुई और उसके बाद बडी ही तेजी से महाराष्ट्र कोरोना प्रभावित सबसे बडा राज्य बन गया.

यहां गौर करने वाली बात ये है कि ठाकरे पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं. वे अपनी पार्टी शिवसेना तो करीब 2 दशकों से चला रहे थे लेकिन सरकार चलाने का कोई अनुभव उनके पास नहीं था. इसके अलावा जिस सरकार के वे मुखिया है वो विपरीत विचारधाराओं वाली 3 अलग अलग पार्टियों की सरकार है. ऐसे में सवाल खडा हुआ कि क्या इतने बडे संकट से निपटने के लिये अलग अलग पार्टियों के बीच बंटे सरकार के तमाम मंत्रालयों में तालमेल हो पायेगा. उद्धव ठाकरे एक चक्रव्यूह में फंसे नजर आ रहे हैं. इत्तेफाक देखिये कि महाभारत का चर्कव्यूह कौरवों ने बनाया था और महाराष्ट्र का चक्रव्यूह कोरोना ने बनाया है.

महाभारत में अभिमन्यु जब कौरवों के बनाये चक्रव्यूह में फंसे थे तब उनके सामने चुनौती थी, एक एक करके 7 घेरों को तोडने की. उद्धव ठाकरे जिस चक्रव्यूह में फंसे हैं उनमें 5 घेरे हैं. आईये एक एक करके जानते हैं क्या हैं वे घेरे.

पहला घेरा- लगातार बढ रही मरीजों और मृतकों की संख्या

मुंबई में पुलिस लॉकडाऊन तोडने वालों को तो अपनी गिरफ्त में ले रही है लेकिन साथ साथ खुद कोरोना की गिरफ्त में भी आ रही है.बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को भी कोरोना ने अपनी जकड़ में ले लिया है. राज्य के 64 पुलिसकर्मी कोरोना पॉजिटिव पाए गए जिनमें 34 मुंबई के हैं.अब तक 3 पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है.

पुलिसकर्मियों के अलावा बीते हफ्ते यहां 57 पत्रकार कोरोनाग्रस्त हो गये. डॉक्टरों, नर्सों और हेल्थ वर्कर्स के कोरोना पॉजिटिव होने का सिलसिला भी लगातार जारी है. इसी हफ्ते मुंबई के 2 बड़े अस्पताल जसलोक हॉस्पिटल और भाटिया अस्पातल के कई डॉक्टर और नर्स कोरोना पॉजिटिव पाए गए.

महाराष्ट्र के बडे शहर जैसे मुंबई, पुणे और ठाणे कोरोना के बडी तादाद में मिल रहे मरीजों के कारण रेड जोन में हैं. मुंबई अब भी कोरोना प्रभावित महाराष्ट्र का सबसे बडा शहर बना हुआ है. कोरोना मरीजों के बडी संख्या के पीछे ठाकरे सरकार का दावा है कि राज्य में सबसे ज्यादा टेस्ट करवाये जा रहे हैं इसलिये मरीज भी बडी तादाद में पता चल रहे हैं. मृतकों की बडी संख्या के बारे में सरकार का कहना है कि ज्यादातर मरीज उस वक्त अस्पताल में आते हैं जब उनकी हालत काफी बिगड़ चुकी होती है.

दूसरा घेरा- पर-प्रांतीय मजदूर

उद्धव ठाकरे के लिये दूसरी चुनौती वे मजदूर हैं जो लॉकडाऊन की वजह से महाराष्ट्र के अलग अलग इलाकों में फंस गये हैं. सरकार और तमाम सामाजिक संगठन ये भरसक कोशिश कर रहे हैं कि मजदूर भूखे न रहें, लेकिन उनके सामने भुखमरी का डर कायम है. इस डर के पीछे उनकी ये आशंका भी है कि महाराष्ट्र में लॉकडाऊन 3 मई से आगे भी बढ सकता है. महाराष्ट्र में लगातार अब भी सड़कों पर तमाम मजदूर अपने परिवार के साथ पैदल चलते नजर आ रहे हैं,  जिनकी मंजिल उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के गांव हैं. ज्यादातर मजदूर इस फिक्र के साथ अपने राज्यों की ओर निकलें हैं कि यहां वे भुखमरी के शिकार हो सकते हैं. सरकार और सामाजिक संस्थाएं कितने दिनों तक उन्हें खिलाएंगीं. मजदूरों की चिंता कम करने के लिये उद्धव ठाकरे ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि सरकार उनके ख्याल रखेगी और खाने का इंतजाम करेगी.

उद्धव ठाकरे हालांकि मजदूरों को भरोसा तो दिला रहे हैं लेकिन उन्हें ये भी पता है कि लंबे वक्त तक इतने मजदूरों को संभाल पाना शायद सरकार के लिए मुमकिन नहीं हो पायेगा. यही वजह है कि उन्होने केंद्र सरकार से दरखास्त की है कि जो मजदूर वापस लौटना चाहते हैं उनके लिये विशेष ट्रेनें चलाईं जायें और इस सिलसिले में अप्रैल के आखिर तक गाईडलाईन तय कर ली जायें. उद्धव ठाकरे की मांग का समर्थन करते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने भी रेल मंत्री पियूष गोयल को एक खत लिखा है. पवार के मुताबिक महाराष्ट्र एक औद्योगिक राज्य है और यहां दूसरे राज्यों के करीब साढे 6 लाख मजदूर रहते हैं. 3 मई के बाद से अगर सरकार ट्रेनें शुरू करने का फैसला करती है तो ऐसी हालत में स्टेशनों पर भीड़ उमड़ पड़ेगी और कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है. इसलिये पहले से ही उन्हें वापस भेजने के इंतजाम किये जाने चाहिये. अपनी बात रखने के लिये पवार ने 14 अप्रैल को बांद्रा में जमा हुई भारी भीड़ का भी हवाला दिया.

तीसरा घेरा- अफवाह

कोरोना में लॉकडाउन के दौरान उद्धव ठाकरे के लिये अफवाहें भी एक चुनौती बनकर उभरीं. अफवाहों की वजह से पालघर में कई हिंसक वारदातें हुईं और एक वारदात में 2 साधुओं समेत 3 लोगों की जान चली गई. उस घटना को सांप्रदायिक और सियासी रंग देने की भी कोशिश की गई.16 अप्रैल को अफवाह से प्रभावित भीड ने 2 साधु और उनके ड्राईवर की हत्या कर दी. दोनो साधु सूरत में अपने एक साथी के अंतिम संस्कार में जा रहे थे. चूंकि हाई वे पर पुलिस लॉकडाऊन के चलते रोक रही थी इसलिये इन्होने जंगल के अंदर से गुजरने वाला रास्ता लेना तय किया. गडचिंचली गांव के पास एक फोरेस्ट चौकी पर जब उनकी कार पहुंची तो हिंसक भीड ने उनपर हमला कर दिया. उन्हें बचाने आई पुलिस टीम पर भी हमला किया गया. जब पुलिसकर्मी अपनी जान बचाकर भाग गये तो भीड ने तीनों को पीटपीट कर मार डाला. ये भीड इस अफवाह की वजह से सडक पर से गुजरने वाले हर वाहन को रूका रही थी कि लॉकडाऊन का फायदा उठाकर इलाके में चोर और लुटेरे घूम रहे हैं. लोगों को अगवा करके उनकी किडनी निकाली जा रही है.बीते 2 हफ्तों में अफवाहों के चलते लोगों से मारपीट की करीब 4 वारदातें हो चुकीं हैं. पुलिस अब तक अफवाह फैलाने वालों का पता नहीं लगा सकी है. साधुओं की हत्या के बाद जिस तरह से सियासत हो रही थी उसपर उद्धव ठाकरे को खुद चेतावनी देनी पडी कि अगर कोई मामले को सांप्रदायिक रंग देता है तो उसके खिलाफ कडी कानूनी कार्रवाई होगी.

चौथा घेरा- क्वारंटाईन सेंटर्स का हाल

जो लोग कोरोना पॉजिटिव पाये गये हैं उनको क्वारंटाईन में रखने के लिये मुंबई महानगरपालिका की ओर से कई सारे क्वारंटाईन सेंटर बनाये गये हैं…लेकिन जिन लोगों को क्वारंटाईन सेंटर में रखा जाता है उनका क्या हाल होता है. क्या वहां उनकी देखभाल हो पाती है. हमारे पास क्वारंटाईन सेंटर में मौजूद लोगों ने कुछ वीडियो भेजे हैं और बताया है कि वे परेशान हैं. इस तरह के केंद्रों पर साफ सफाई का तो अभाव है ही लोगों को ठीक खाना मिलने और पीने का पानी मिलने में भी दिक्कत आ रही है.

सरकार के लिये ये चुनौती है कि जिस बडी तादाद में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ रही है और जिस तरह से इन मरीजों के संपर्क में आये हुए लोगों को क्वारंटाईन किया जा रहा है, उसी अनुपात में उनके इलाज और देखभाल का भी इंतजाम हो. क्वारंटाईन सेंटर की हालत देखकर उनमें जाने से बचने के लिये कहीं लोग टेस्ट कराने से कतराने न लग जायें.

पांचवां घेरा- कुर्सी को खतरा

कोरोना ने उद्धव ठाकरे के लिये एक सियासी संकट भी पैदा कर दिया है. उनका मुख्यमंत्री पद खतरे में पड गया है. अगर महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने ठाकरे को 28 मई के पहले विधान परिष्द के सदस्य के तौर पर नामांकित नहीं किया तो ठाकरे सरकार गिर सकती है जिसके बाद महाराष्ट्र में फिरसे एक राजनीतिक ड्रामा शुरू हो सकता है.दरअसल संविधान के मुताबिक मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले शख्स को 6 महीने के भीतर राज्य के विधी मंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना जरूरी है. जब उद्धव ठाकरे सीएम बने तब वे न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के. ठाकरे को उम्मीद थी कि अप्रैल के मध्य में जब विधानपरिषद की खाली सीटों के लिये चुनाव होंगे तो वे किसी एक सीट पर चुन लिये जायेंगे…लेकिन मामला तब बिगड़ गया जब बीच में कोरोना संकट आ गया. चुनाव टाल दिये गये. अब ठाकरे के पास विधानपरिषद में जाने के लिये यही विकल्प रह गया कि वे राज्यपाल के कोटे से सदन के लिये नामांकित हों. इसी उम्मीद के साथ उनका नाम राज्यपाल के पास कैबिनेट ने भेज दिया है…लेकिन 3 हफ्ते हो चुके हैं और राज्यपाल ठाकरे को विधानपरिषद सदस्य नामांकित किये जाने की सिफारिश पर कोई फैसला ही नहीं ले रहे. इससे शिवसेना में चिंता का वातावरण पैदा हो गया है. अगर 28 मई तक राज्यपाल ने उन्हें सदस्य नामांकित नहीं किया तो ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ेगा और सरकार गिर जायेगी.

एक तरफ जहां ठाकरे सरकार कोरोना के जाल को फैलने से रोकने के लिये संघर्ष कर रही है तो वहीं दूसरी ओर विपक्षी पार्टी बीजेपी भी सत्ता में वापसी के हाथ पैर मार रही है. ऐसे में बीजेपी भी नजरें गड़ाए हुए बैठी है कि 28 मई तक उद्धव ठाकरे के साथ क्या होता है.

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